शख्सियत

कभी डायन कहकर जिन्हें ससुरालवालों ने घर से निकाला, वो आम महिला कैसे बन गयीं पीड़ितों की मसीहा? पद्मश्री से बढ़ा हौसला


  रिपोर्ट - नीलम मिश्रा 30 Nov 2025 / 08:26 PM

पद्मश्री छुटनी महतो. एक वक्त था, जब इन्हें डायन कहकर ससुरालवालों ने गांव-घर से बाहर निकाल दिया था, लेकिन विपरीत हालात में भी इन्होंने हिम्मत से काम लिया और डायन जैसी कुप्रथा से पीड़ित महिलाओं की मदद करने लगीं. इसके लिए लंबा संघर्ष कीं. केंद्र सरकार ने झारखंड के सरायकेला जिले के गम्हरिया प्रखंड के बीरबांस की एक आम महिला छुटनी महतो के हौसले को बढ़ाया. वर्ष 2021 में इस शेरनी को पद्मश्री से सम्मानित किया.

 


सरायकेला (गम्हरिया) : झारखंड के सरायकेला जिले के गम्हरिया प्रखंड के बीरबांस की एक आम परिवार की महिला छुटनी महतो को डायन कहकर ससुरालवालों ने कभी खूब सताया था. उनका जीना मुहाल कर दिया था, लेकिन उन्होंने उसका डटकर मुकाबला किया. आज वह महिलाओं की बुलंद आवाज बन गयी हैं. डायन जैसी कुप्रथा और जादू-टोने के नाम पर औरतों पर हो रहे जुल्म के खिलाफ छुटनी महतो तीन दशक से संघर्ष रही हैं.

पद्मश्री से सम्मानित हुईं छुटनी महतो
वर्ष 2021 में केंद्र सरकार ने इनका हौसला बढ़ाया. समाज में फैली डायन जैसी कुरीतियों के खिलाफ शुरू किए गए आंदोलन की वजह से छुटनी महतो को पद्मश्री से सम्मानित किया गया. नौ नवंबर 2021 को तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया. आज इलाके के लोग उन्हें शेरनी कहकर पुकारते हैं. आज भी बीरबांस में ही परिवार परामर्श केंद्र के नाम पर सहायता केंद्र चलाकर शोषित और पीड़ित महिलाओं और पुरुषों को न्याय दिलाने के लिए आवाज उठा रही हैं. बेसहारा औरतों की देखभाल भी करती हैं.


आम से खास बनने का सफर कैसे तय कीं?


करीब 30 साल पहले की बात है. डायन बताते हुए छुटनी महतो को गांव-घर से निकाल दिया गया था, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. हौसला बुलंद रखा और डटकर मुकाबला किया. आज भी अंधविश्वास और डायन कुप्रथा के खिलाफ लोगों को जागरूक कर रही हैं. पद्मश्री छुटनी महतो ने कहा कि अंतिम सांस तक शोषित और प्रताड़ित महिलाओं एवं अन्य लोगों की मदद करती रहेंगी. प्रताड़ित महिलाओं की सहायता करना ही उनका धर्म है. कभी डायन बताकर गांव-घर से निकाली गयीं छुटनी महतो आज इस कुप्रथा की शिकार महिलाओं के लिए मसीहा बन चुकी हैं.