गांव

कभी गूंजती थी गोलियों की तड़तड़ाहट, संकट में होती थी ग्रामीणों की जान, बालूवाले गांव की कैसे बदली तस्वीर?


  रिपोर्ट-गुरुस्वरूप मिश्रा 03 Dec 2025 / 05:55 PM

एक वक्त था, जब झारखंड के नक्सल प्रभावित बालुडीह गांव में गोलियों की तड़तड़ाहट गूंजती थी. पुलिस-नक्सली भय से ग्रामीणों की जान संकट में होती थी. दो पाटों के बीच वे पीसने को मजबूर थे. विकास की दस्तक और पुलिसिया सशक्तीकरण के साथ बालूवाले गांव की तस्वीर धीरे-धीरे बदलने लगी.


पलामू (पांकी)- 'बदल गया है गांव ये मेरा, बदल गयी हैं गलियां भी, अब तो सूखी-सूखी हैं, फूलों की ये कलियां भी. चौपालों में सूनापन है, चौराहे पर सन्नाटा है, हस्तशिल्प के पंखे गायब, मिलता अब तो फर्राटा है.’ ये पंक्तियां गांव-देहात की बदलती तस्वीर की जमीनी हकीकत बयां कर रही है. गांव का नाम सुनते ही अक्सर कच्ची सड़कें, खेत-खलिहान में गुली-डंडा खेलते बच्चे और रात में ढिबरी के पास बैठकर पढ़ते छात्र जेहन में तैरने लगते हैं. आज भी गांव को लेकर आप ऐसा ही सोचते हैं तो इस भ्रम से बाहर निकलिए. कच्ची सड़कों की जगह पीसीसी सड़कों पर रफ्तार से बात करतीं गाड़ियां, साइकिल की जगह घर में बाइक, पैदल की बजाए साइकिल से स्कूल जाती लड़कियां, हर घर में मोबाइल, घूप अंधेरे में ढिबरी या लालटेन की जगह बिजली या सोलर लाइट की सुविधाएं हैं. बदलाव की ये सच्ची कहानी झारखंड के बालुडीह गांव की है. पढ़िए स्पेशल रिपोर्ट.


स्वागत करता है 100 साल पुराना बरगद का पेड़
कभी नक्सल प्रभावित रहा बालुडीह पलामू जिले के पांकी प्रखंड मुख्यालय से चार किलोमीटर दूर है. पांकी-रांची मुख्य सड़क पर सोरठ गांव से पूर्व दिशा में नावाडीह के बाद यह गांव है. गांव में प्रवेश करते ही आहर के किनारे करीब 100 साल पुराना विशाल बरगद का पेड़ आपका तहे दिल से स्वागत करता है.



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बालू से लेकर आम के पेड़ तक हो गए गायब

कभी बालुडीह गांव में बालू ही बालू हुआ करती थी. बच्चे वहां खूब खेला करते थे. बचपन के दिनों के साथ अब बालू गायब हो गयी. अब पक्की सड़कें हैं. पलाश और आम के पेड़ भी अब खोजे नहीं मिलते. पलाश के फूलों से और इनके झुरमुटों में छिपने-पकड़ने का खेल भी सपना हो गया. आम के काफी पेड़ थे. तेज हवा चलते ही गांव के लोग आम चुनने पेड़ के नीचे पहुंच जाते. पुरुष और महिलाओं समेत बच्चों का हुजूम आम के पेड़ के नीचे उमड़ पड़ता. चरंबा (आम के चार पेड़ एक ही जगह), पचंबा (आम के पांच पेड़ एक ही जगह) समेत मिसरिया आम की मिठास आज की पुरानी यादों को ताजा कर देती है. अब ढूंढे एक आम का पेड़ तक नहीं मिलता. बालू से लेकर आम के पेड़ तक गायब. आम के पेड़ काट दिए गए. 


नावाडीह से बालुडीह तक की सड़क आज भी पक्की नहीं
वक्त बदला. परिस्थितियां बदलीं. विकास धीरे-धीरे गांव की तरफ बढ़ने लगा. नावाडीह से बालुडीह की सड़क तीन दशक बाद भी अच्छी नहीं है. हां, पहले से स्थिति थोड़ी ठीक हुई है. बरसात में अब कोई हाथ में चप्पल-जूता उठाकर सड़क पर चलता नहीं दिखता. कच्ची सड़क खासकर बरसात में आज भी लोगों को परेशान करती है. गांव के जंगल की तरफ काफी पहले पक्की सड़कें बन गयीं, जहां उनकी जरूरत नहीं थी, लेकिन मुख्य पथ आज भी खस्ताहालत में है, जबकि यहां से रोजाना सैकड़ों लोगों का आना-जाना होता है. साइकिल, बाइक से लेकर ऑटो और ट्रैक्टर तक रोज चल रहे हैं, लेकिन सिस्टम की दूरदर्शिता पर देखिए. नक्सल प्रभावित बालुडीह में ढिबरी बारने के दिन भी लद गए. अब बिजली और सोलर लाइट की दूधिया रोशनी है. पहले गांव में गिनती के पढ़े-लिखे लोग थे. अब हर घर में कमोबेश पढ़ा-लिखा मिल जाएगा. 


बरसात में पहले पैदल चलना था मुश्किल
बरसात के दिनों में गांव में प्रवेश करनेवाली मुख्य सड़क (कच्ची) पर पैदल चलना दूभर था. साइकिल से गुजरना तो काफी मुश्किल था. हाथ में चप्पल-जूता उठाकर काफी मशक्कत के बाद केवाल मिट्टी वाली सड़क पर लोग चल पाते थे. अब भी मोरम-पत्थर वाली सड़क है. इससे लोगों को पहले से राहत है. आज भी पक्की सड़क का इंतजार है. 



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70 के दशक के बाद से दिखने लगी बदलाव की झलक

साल 1956 की बात है. बालुडीह गांव में कुल 12 घर थे. दो घर ब्राह्मण, तीन घर कुम्हार (प्रजापति), दो घर यादव और पांच घर भुइयां जाति के थे. चारों बिरादरी के अलग-अलग टोले थे. गांव में प्रवेश करते ही सबसे पहले ब्राह्मण टोला मिलता. दायीं ओर कुम्हार टोला और थोड़ी दूर पर जंगल के समीप यादव और भुइयां टोला था. इस छोटे से गांव की आबादी करीब 50 थी. सभी के मकान मिट्टी के थे. खेती-बारी ही आजीविका का मुख्य साधन था. पीने के पानी के लिए चार कुएं थे. कोई स्कूल गांव में नहीं था. दो किलोमीटर दूर मंगलपुर जाकर कुछ लोग पढ़ते थे. बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव था. काफी गरीबी थी. गांव में किसी के पास साइकिल तक नहीं थी. बिजली, सड़क, स्कूल किसी तरह की कोई सुविधाएं नहीं थीं. इलाज के लिए भी चार किलोमीटर दूर पांकी जाना पड़ता था. गांव में बालू, पलाश और आम के पेड़ काफी संख्या में हुआ करते थे. चारों तरफ हरियाली रहती थी. महज पांच सौ मीटर की दूरी पर घने जंगल इसकी शान हुआ करते थे. 70 के दशक से गांव में कुछ बदलाव  दिखने लगा. कुछ घरों में साइकिल आयी. धीरे-धीरे गांव में रेडियो बजने लगे. उस वक्त यह मनोरंजन का इकलौता माध्यम था. इसके जरिए देश-दुनिया की खबरें मिलने लगीं. गांव में रोजगार का अभाव था. काम की तलाश में लोग पंजाब और दिल्ली जाया करते थे. आज भी गांव के युवा रोजगार के लिए पंजाब, हरियाणा, तमिलनाडु, छत्तीसगढ़ जाने पर मजबूर हैं. 


भ‍ंडार घर में चलता था स्कूल, 2010 में आयी बिजली
साल 1985 में भुइयां टोला में पांकी के पूर्व मुखिया हरिद्वार साव का मिट्टी का भंडार घर था. उसी में स्कूल चलने लगा. पास के कुएं से बच्चे पानी पीया करते थे. 90 के दशक में स्वर्गीय रामनंदन मिश्र ने स्कूल के लिए जमीन दान दी. राजकीय उत्क्रमित मध्य विद्यालय, उलगाड़ा में चोरया, उलगाड़ा और बालुडीह, इन तीनों गांवों के बच्चे आज भी पढ़ने आते हैं. गांव में पहला चापाकल 1997 में लगा. 2010 में गांव में आयी बिजली किसी चमत्कार से कम नहीं थी. शहरों में चमक-दमक और इस गांव के पिछड़ेपन को देख बचपन के दिनों को जब याद करते हैं तो उस वक्त लगता था कि शायद ही इस गांव में कभी बिजली पहुंचेगी. 


अब होली-दिवाली की वो मस्ती भी नहीं रही
होली-दिवाली और दशहरे का आनंद ही कुछ अलग था. जब ग्रामीणों की टोली एक दूसरे के गांवों में जा-जाकर होली खेला करती थी. अब वो होली भी नहीं रही. साल 2000 में झारखंड बनने के बाद से गांव की सूरत धीरे-धीरे ही सही बदलने लगी. झारखंड बने 25 साल बीत गए, लेकिन आज भी गांव का अपेक्षित विकास नहीं हो सका. 



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मुखिया जी की साइकिल देखने के लिए जुट जाती थी भीड़ 
इस गांव के पांच मुहान (चौक) पर हर शाम चौपाल सजती थी. बुजुर्ग, पुरुष, महिलाएं और युवा जुटते थे और यहां-वहां की बातें होती थीं. गांव के बुजुर्ग स्वर्गीय प्यारी प्रजापति कहा करते थे कि 1952 में देववंश नारायण सिंह मंगलपुर पंचायत के मुखिया थे. बुजुर्ग होने के बावजूद साइकिल से गांवों में घूम-घूम कर पंचायती किया करते थे. उनकी साइकिल देखने के लिए लोगों की भीड़ लग जाती थी. छोटे-मोटे मामले वह खुद ही निपटा दिया करते थे. 


1976 में बालुडीह में आयी थी बाढ़
बालुडीह गांव के संजय नाथ मिश्रा बताते हैं कि 1976 में इस गांव में बाढ़ आयी थी. जंगल से काफी सटे होने और तालाबों के लबालब भर जाने के बाद पानी गांव के बीचों-बीच वाली केवाल मिट्टी की सड़कों को खनहारती हुई चोरया की तरफ निकल गया था. इस कारण गांव की पथरीली सड़क पर चलना उस समय काफी मुश्किल भरा था. यादव टोले काफी ऊंचाई पर थे. यहां दलदल कच्ची संकरी सड़क करीब आठ फीट नीचे थी. इस कारण काफी मशक्कत के बाद वे घर में प्रवेश कर पाते थे. इसी रास्ते से होकर गांव के लोग गाय-बकरी चराने जंगल जाया करते थे. कीचड़ और संकरी सड़क से गुजरने का बचपन के दिनों में अलग ही अहसास था. हाल में बनी पीसीसी सड़कों ने उस खाई को पाट दी है. 


पहले पैदल, अब साइकिल से स्कूल जाते हैं लड़के-लड़कियां 
प्रभा देवी बताती हैं कि पहले इस गांव के लड़के-लड़कियां मिडिल स्कूल तक की पढ़ाई के लिए दो किलोमीटर दूर पैदल मंगलपुर जाया करते थे. चार किलोमीटर दूर पैदल चल कर पांकी हाईस्कूल पढ़ने जाना पड़ता था. समय के साथ अब स्थिति बदली है. लड़कियों के पास साइकिल है, इससे वह अब आराम से पढ़ाई करने पांकी जाती हैं. लड़के भी पांकी जाकर हाईस्कूल की पढ़ाई पूरी करते हैं. 


गांव में है मिनी आंगनबाड़ी केंद्र 
बालुडीह गांव में मिनी आंगनबाड़ी केंद्र है. सेविका सिंधू मिश्रा बताती हैं कि यहां बच्चों को पोषाहार दिया जाता है. 


नक्सलियों की बोलती थी तूती
जंगल से सटे होने के कारण बालुडीह कभी नक्सल प्रभावित इलाका था. 90 के दशक में पांकी इलाके में नक्सलियों की तूती बोलती थी. उनके इशारे के बिना पत्ता तक नहीं हिलता था. पुलिस-नक्सली मुठभेड़ के बीच कई बार आम आदमी भी पीस जाता था. गांव वाले दो पाटों के बीच पीसने को मजबूर थे. पुलिस का भय और नक्सलियों के उत्पात के बीच वे लाचार थे. गांव से होकर ही माओवादी या अन्य नक्सली संगठन के लोग गुजरते थे. कई बार गांव में ही रुक जाते. ठहर जाते. पूरे गांव में खाना बनाने का हुकूम सुना दिया जाता. इस बीच गांव के लोगों की जान सांसत में होती थी. नहीं बनाएं या विरोध करें तो जान से हाथ धोना पड़ेगा. वैसे विरोध करने का साहस कौन करता? हथियारबंद नक्सलियों से कौन लोहा लेकर अपनी जान दांव पर लगाता? दूसरी तरफ पुलिस के धमकने का भी डर. कहीं पुलिस आ गयी तो फिर घर-परिवार का क्या होगा? संकट में जान होती थी. 


संकट में होती थी गांववालों की जान
नक्सली घर-आंगन में राइफल समेत अन्य हथियार रखकर आराम से खाना-पीना खाकर जंगल के रास्ते निकल लेते थे. उनके जाने के बाद ग्रामीण राहत की सांस लेते थे. पांकी थाना गांव से महज चार किलोमीटर दूर था, लेकिन पुलिसिया निष्क्रियता कहिए या उनकी निर्भयता. वे सुबह, शाम और दोपहर में भी गांव से गुजर जाते थे. जब इच्छा होती, रुकते, ठहरते, खाते-पीते और बेफिक्र होकर निकल जाते. जैसे पुलिस से उन्हें कोई भय ही नहीं. लंबे वक्त के बाद स्थितियां बदलीं. पास के ताल गांव में पुलिस कैंप समेत पांकी थाना के सशक्त होने के कारण नक्सलियों की धमक कम होने लगी. अब स्थिति सामान्य है. गांव के लोग भी अब बेफिक्र हैं.


गजब की छा जाती थी खामोशी
बचपन के दिनों में गांव में नक्सलियों (माओवादी) का आना, भोजन के लिए रुकना, सुदूर जंगलों में जन अदालत लगाना और आस-पास में कई घटनाओं को अंजाम देना आज भी ढाई-तीन दशक पहले की याद ताजा कर देता है. गांव में उनके धमकने पर गजब की खामोशी छा जाती थी. भय के बीच सब कुछ राम भरोसे होता था. 

खेतों से गायब हो गए मिलेट्स

पहले गोलनी, सावां, तिसी, ज्वार, मकई (मक्का), सरसों, जिनोर, बाकर धान (लाल चावल), बाकर करमी धान (लाल चावल), डांड़ बाको (लाल चावल) और तिल समेत अन्य की खेती होती थी. कलमदानी (सफेद चावल), झूना धान और टायचून धान की खेती लोग किया करते थे. वक्त बदला धीरे-धीरे मिलेट्स (मोटे अनाज की खेती) की खेती खेतों से गायब होने लगी. अब लोग सोनम, आरआई 64, आरआई 36 किस्म के धान की खेती करने लगे हैं. गेहूं की खेती गांव में नहीं के बराबर होती है. वजह साफ है सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है. बरसाती पानी (बारिश) पर खेती पूरी तरह निर्भर है. गांव के किसानों की स्थिति में आज भी ज्यादा बदलाव नहीं आया है. पहले की तरह ही वे खेती-बाड़ी कर रहे हैं और उस पर निर्भर हैं. कृषि विभाग की कुछ योजनाओं का आर्थिक लाभ पिछले कुछ वर्षों से किसान परिवारों को मिलने लगा है. वैसे सिंचाई की सुविधाओं का आज भी किसानों को इंतजार है. 


लाह की खेती से होती थी आमदनी
90 के दशक में बालुडीह गांव में पलाश के काफी पेड़ हुआ करते थे. बैर के भी काफी पेड़ थे. लाह की खेती लोग किया करते थे. उसकी बिक्री 10-20 रुपए किलो से 100 रुपए किलो तक हुआ करती थी, लेकिन ये रकम भी उस वक्त के लिए बड़ी थी. रोजगार का अभाव था, लिहाजा आमदनी का अच्छा जरिया था. पेड़-पौधों की गांव में भरमार थी. प्राकृतिक छटा देखते ही बनती थी. पलाश, बेल, गम्हार, आम, बैर, लिप्टस, जामुन समेत कई किस्म के पेड़-पौधे गांव की हरियाली बढ़ाते थे, लेकिन अब इनमें गिनते के पेड़ (बैर और बेल) बचे हैं. 


जब आ जाते थे बाघ-शेर
साल 1970 की बात है. गांव के जंगल के नजदीक तुलसी भुइयां के घर तक तो बाघ-शेर आ जाते थे. इनके पंजे के निशान देख लोग कांप उठते थे. बालुडीह गांव के आखिरी छोर (जंगल) पर इनका घर था. इनकी जान संकट में होती थी. हालांकि किसी तरह के जान-माल का नुकसान नहीं हुआ. पास के गांव उलगाड़ा और बालुडीह में 2025 में भी लोमड़ी दिख जाती है. 


जब गांव में आ गया था हाथी
वर्ष 2018 में गांव में हाथी आ गया था. बालुडीह से गुजरते हुए पास के गांव चोरेया की तरफ चला गया था. इस दौरान भी किसी तरह का बड़ा नुकसान नहीं हुआ था. सड़क पर खूंटे में बंधे पशुओं में हड़कंप जरूर मच गया था. विशालकाय हाथी को देख वे खूंटे को तोड़कर भागने लगे थे.


महुआ के दिनों में जंगल ही होता है अड्डा
महुआ के दिनों की बात ही अलग है. अपने मां-पिता के साथ बचपन से ही महुआ चुनने जंगल जाया करता था और उनकी मदद करता था. गांव की महिलाएं, पुरुष और बच्चे सुबह से ही जंगल की तरफ रवाना हो जाते थे. कुछ तो ऐसे थे कि कोई उनका महुआ चुन न ले, इसलिए वे सुबह तीन-चार बजने से पहले ही जंगल पहुंच जाते थे. सुबह महुआ चुराने और भैंस के खाने का भी डर रहता था. इसलिए सभी अपने महुआ पेड़ों के पास जमे रहते थे. दोपहर तक जंगल में महुआ के पेड़ों के पास लोग डटे रहते थे. इसके बाद टोकरी में महुआ चुनकर लोग घर लौटते थे. इसमें पूरा परिवार लगा रहता था. बारी-बारी से भी लोग जंगल आते-जाते थे और महुआ चुनकर घर लाते थे. ग्रामीणों की आय का यह अच्छा साधन था. स्थितियां आज भी ज्यादा नहीं बदलीं. आज भी हर वर्ग के लोग महुआ चुनने जंगल जाते हैं. इससे इन्हें अच्छी आमदनी हो जाती है. 


ग्रामीणों के लिए एटीएम थीं बकरियां
एक वक्त था, जब जलावन के लिए लकड़ियां लाना और बकरियां चराना गांववालों के लिए रोजमर्रा का काम था. गरीबी इस कदर थी कि हर बिरादरी के लोगों की मजबूरी थी. हर घर में बकरियां मिल जातीं. ये बिल्कुल गरीबों के लिए एटीएम की तरह थीं. कई बार जंगल में जब बकरियां चरती थीं तो लकड़बग्घे बकरियों को अपना शिकार बना लेते थे. इससे ग्रामीणों को आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ता था. हालांकि ग्रामीण जंगल में चराते वक्त बकरियों पर नजर रखते थे, फिर भी कई बार बकरियों की जान चली जाती थी. ब्राह्मण, कुम्हार, भुइयां और यादव यानी सभी जाति उस वक्त बकरी पालन करते थे. सामूहिक जंगल जाते और बकरियां चराते थे.