रिपोर्ट - नीलम मिश्रा
07 Dec 2025 / 10:04 PM
सीयूजे (झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय) की टीम पतरातू घाटी और हुंडरू फॉल पहुंची. यहां की खूबसूरत वादियों का आनंद लेते हुए स्थानीय दुकानदारों समेत अन्य से बातचीत की. पर्यावरण और संस्कृति से रू-ब-रू हुई. सीयूजे में आयोजित दो-साप्ताहिक आईसीएसएसआर-प्रायोजित क्षमता निर्माण कार्यक्रम (CBP) के सातवें दिन प्रतिभागियों को सांस्कृतिक और पर्यावरणीय रूप से महत्वपूर्ण स्थलों का भ्रमण कराया गया.
रांची-सीयूजे (झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय) में आयोजित दो-साप्ताहिक आईसीएसएसआर-प्रायोजित क्षमता निर्माण कार्यक्रम (CBP) के सातवें दिन प्रतिभागियों को रांची एवं आसपास के सांस्कृतिक और पर्यावरणीय रूप से महत्वपूर्ण स्थलों विशेष रूप से पतरातू घाटी और हुंडरू फॉल का शैक्षणिक भ्रमण (फील्ड विजिट) कराया गया. इस शैक्षणिक भ्रमण का उद्देश्य सामाजिक विज्ञान के शोध दृष्टिकोण से प्राकृतिक, सांस्कृतिक और सामुदायिक संदर्भों का प्रत्यक्ष अवलोकन करवाना था.
पतरातू पहुंचे प्रतिभागी
पाठ्यक्रम निदेशक प्रो तपन कुमार बसंतिया ने प्रतिभागियों की जिज्ञासा शांत की. अनुशासित अवलोकन और सांस्कृतिक संवेदनशीलता के साथ फील्ड विजिट में शामिल होने के लिए प्रेरित किया. NAAC को-ऑर्डिनेशन कमिटी के अध्यक्ष प्रो केबी पांडा, शिक्षा विभागाध्यक्ष प्रो विमल किशोर तथा सह-पाठ्यक्रम निदेशक डॉ संहिता सुचरिता भी प्रतिभागियों के साथ थे. पतरातू घाटी की यात्रा ने प्रतिभागियों को यह समझने का मौका दिया कि वहां का पर्यटन, प्राकृतिक वातावरण और स्थानीय संस्कृति किस तरह लोगों की जिंदगी और रोजगार को प्रभावित करते हैं. पतरातू डैम में प्रतिभागियों ने नौकायन (Boating) से संबंधित स्थानीय लोगों, नाव चलाने वालों और दुकानदारों से बातचीत की और जाना कि प्राकृतिक संसाधन वहां की अर्थव्यवस्था और लोगों के दैनिक जीवन के लिए कितने महत्वपूर्ण हैं. स्थानीय कारीगरों और छोटे दुकानदारों से बातचीत करके प्रतिभागियों ने उस क्षेत्र की सांस्कृतिक परंपराओं, हस्तशिल्प और पारंपरिक तरीकों के बारे में जानकारी ली.
हुंडरू फॉल का भी किया अवलोकन
हुंडरू फॉल पहुंचकर प्रतिभागियों ने आसपास की खूबसूरत प्राकृतिक जगहों को देखा और पास में रहने वाले अलग-अलग आदिवासी समुदायों के लोगों से बातचीत की. उन्होंने उनकी स्थानीय परंपराओं, पारंपरिक ज्ञान, रोज़ी-रोटी के तरीकों और सामाजिक–सांस्कृतिक जीवन को समझा. प्रतिभागियों ने यह भी जाना कि प्राकृतिक पर्यटन स्थल कैसे स्थानीय पहचान बनाते हैं. लोगों की आजीविका में मदद करते हैं और ईको-टूरिज़्म को बढ़ावा देते हैं.